“प्रदूषण की गिरफ्त में पाली – लोगो का जीना हुआ मुश्किल”
पाली मे प्रदूषण की स्थिति को बदसे बदतर

राजस्थान के पाली जिले में टेक्सटाइल और डाईंग उद्योग फैले हुए है। कभी यह उद्योग रोज़गार और समृद्धि का प्रतीक माने जाते थे, लेकिन आज वही उद्योग जहरीला पानी, बदबूदार धुआं और बीमारियाँ बाँट रहे हैं। हाल ही में आपकी प्रिय पत्रिका पर्यावरण टुडे ने पाली का दौरा किया तो जो मंजर देखने को मिला वह यहां की स्थिति को बदसे बदतर दिखा रहा है। पाली के इंडस्ट्रियल एरिया फेज़ 3 में इंडस्ट्रियल वेस्ट के ढेर दैखे गये। गायों का एक झुंड आराम से प्लास्टिक सहित औद्योगिक कचरा खा रहा है। आसमान काले धुएं से ढक गया है। पाली औद्योगिक क्षेत्र में जल निकासी के लिए बनी नालियां प्रदूषित पानी, काले मटमैले पानी से भरी हुई देखी जा रही हैं।
क्या कर रहे हैं आरएसपीसीबी के क्षेत्रीय अधिकारी?

राजस्थान का पाली जिला आज प्रदूषण के भंवर में फँसा हुआ है। यहाँ की टेक्सटाइल और डाईंग इंडस्ट्रीज वर्षों से जहरीला पानी और धुआँ बिना रोकटोक छोड़ रही हैं। पर सवाल ये है कि आरएसपीसीबी के क्षेत्रीय अधिकारी क्या कर रहे हैं? पाली का ये हालिया मंजर राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण मंडल के क्षेत्रीय अधिकारी की भूमिका पर एक नहीं अनेक सवाल खडा कर रहा है। ऐसी भी चर्चा सुनाई दे रही है की राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (RSPCB) के स्थानीय अधिकारी सालाना निरीक्षण और रिपोर्ट तो बनाते हैं, पर हकीकत में ETP और CETP ज्यादातर समय बंद रहते हैं। तो क्या जाँच केवल कागजों पर ही हौती है? पानी और हवा के सैंपल पहले से तय जगहों से लिए जाते हैं, जहाँ प्रदूषण कम दिखे। तो क्यां यै नमूना जांच में धांधली है? लोग और सामाजिक संगठन जब शिकायत दर्ज कराते हैं, तो अधिकतर मामलों में “कार्रवाई चल रही है” जैसी औपचारिक प्रतिक्रियाएँ दी जाती हैं। तो क्यां यह शिकायतों पर उदासीनता को दर्शाता है?

यह तो सिर्फ कुछ ही सवाल है, जिन के जवाब चाहे कुछ भी हो लेकिन जो हालिया स्थिति है उस के परिणाम अत्यांतिक गंभीर है। नदी और भूजल पूरी तरह दूषित हो रहे है, लोग गंभीर बीमारियोँ के शिकार हो रहे है और खेतीबाड़ी की जमीनें बंजर हो रही है।
स्थानीय अधिकारीयों की नींद कुंभकर्ण से भी गहरी
अपने नाम के अनुरूप प्रकृति प्रहरी पर्यावरण टुडे ने पाली में हो रहे प्रदूषण को लेकर स्थानीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों की निष्क्रियता को पहले भी कई बार उजागर किया है, लेकिन ये वो अधिकारी हैं जिनकी नींद कुंभकर्ण से भी गहरी है, क्योंकि ये अधिकारी पाली औद्योगिक क्षेत्र में प्रदूषण को नियंत्रित करने में नाकाम हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पाली में प्रदूषण दिन-रात बढ़ता जा रहा है।
किसानों, आम लोगों और पर्यावरण पर गहरा असर

राजस्थान के पाली की टेक्सटाइल यूनिट्स — खासकर कपड़ा रंगाई एवं प्रिंटिंग की इकाइयाँ — वर्षों से हवा और पानी दोनों में भारी प्रदूषण फैला रही हैं। प्रदूषण‑माफिया बेखौफ भारी प्रदूषण फैला रहै हैं, स्थानीय किसानों, आम लोगों और पर्यावरण पर गहरा असर हो रहा है।
मीडिय़ा रिपोर्ट्स अनुसार पाली जिले में लगभग 600 टेक्सटाइल यूनिट्स हैं, जिनमें से ज्यादाचर ‘रेड’ श्रेणी के हैं और गंभीर प्रदूषण फैला रहे हैं। इनसे निकलने वाले अपशिष्ट को बाँडी नदी और लूनी नदी में छोड़ा जाता है, जिससे न केवल नदी की गुणवत्ता प्रभावित होती है बल्कि आसपास का भूजल भी सीसा, आर्सेनिक, क्रोमियम, निकल आदि जैसे भारी धातुओं से दूषित हो चुका है। यहीं कारण है की किसानों की जमीन बंजर हो रही है और कई जलस्त्रोत अब लोगो की प्यास बुजाने लायक नहीं रहे है।
पाली मे सीईटीपी‑सिस्टम रही है विफल

पाली मे सीईटीपी‑सिस्टम की विफलता को लेकर सभी अवगत है। अपनी क्षमता से कम सक्रिय यह सीईटीपी पर्याप्त रूप से अपशिष्टों को नहीं चला पाते। जिन संयंत्रों को ZLD यानी कि जीऱो लिक्विड डिस्चार्ज बताया गया, वे तकनीकी रूप से पूरी तरह सक्षम नहीं हैं; परिणामस्वरूप बिना उपचार के पानी नदी में छोड़ा जा रहा है।
पीने के साफ पानी की समस्या पेदा हो गई है
हर दिन हजारों लीटर डाई और केमिकल युक्त पानी बिना ट्रीटमेंट के नालों और नदी में छोड़ रही टेक्सटाइल यूनिट्स के कारण भूजल भी दूषित हो गया है और हैंडपंपों से मिलने वाला पानी क्रोमियम, सल्फेट और हानिकारक डाई के अवशेष से भर गया है। पाली और आसपास के लोगो के लिए पीने के साफ पानी की समस्या पेदा हो गई है।
काला धुआँ और बदबूदार गैस से साँस लेना मुश्किल
वायु प्रदूषण की बात करे तो बॉयलरों और डाईंग प्रोसेस से निकलने वाला काला धुआँ और बदबूदार गैसें साँस लेने में मुश्किल पैदा कर रही हैं। त्वचा रोग, श्वसन संबंधी बीमारियाँ और कैंसर तक के मामले बढ़ रहे हैं। खेती बर्बाद, मिट्टी की उर्वरता खत्म हो रही है।
प्रदूषण फैलाने वाली फैक्ट्रियाँ बिना दबाव के छूट से चल रही हैं? कागज़ी अनुपालन और ऑडिट के नाम पर अधिकांश प्रदूषण ऑडिट सिर्फ़ दिखावा हैं? अधिकारियों की मौन स्वीकृति ने प्रदूषण माफिया को बेख़ौफ़ बना दिया है?
ये रहे समाधान
पाली की हरियाली को कायम रखने के समाधान की बात करे तो स्वतंत्र एजेंसी से CETP की 24×7 निगरानी करानी चाहिए, NGT और सुप्रीम कोर्ट के पर्यवेक्षण में जांच करानी चाहिए, जन-सुनवाई और पारदर्शिता होनी चाहिए और प्रदूषण फैलाने वाली यूनिट्स पर कठोर दंड और बंदी की सख्ती दिखानी चाहिए।
पाली में प्रदूषण की असली वजह सिर्फ़ उद्योग नहीं हैं, बल्कि स्थानीय अधिकारीओं की लापरवाही और संदिग्ध कार्यशैली भी है। जब तक मजबूत जन आंदोलन और पारदर्शी मॉनिटरिंग नहीं होगी, तब तक पाली की नदियाँ और लोग दोनों ही इस जहरीले खेल के शिकार बने रहेंगे।











