राजस्थान की नदियों में जहर! सुप्रीम कोर्ट की सख्त चेतावनी
- जोधपुर–पाली–बालोतरा में प्रदूषण बेकाबू, 20 लाख लोगों की जिंदगी खतरे में
- जोधपुर–पाली–बालोतरा का यह मामला अब केवल पर्यावरण नहीं बल्कि मानव जीवन के लिए गंभीर संकट बन चुका है
- कोर्ट ने पूरे मामले को “सिस्टेमेटिक फेल्योर” बताया
- सुप्रीम कोर्ट के सख्त आदेश है कि जीरो लिक्विड डिस्चार्ज अनिवार्य है, टैंकर सिस्टम पर पूर्ण प्रतिबंध
नई दिल्ली: राजस्थान की जोजरी, बांडी और लूणी नदियों में फैले गंभीर प्रदूषण के मामले में सुप्रिम कोर्ट (Supreme Court of India) ने कड़ी टिप्पणी करते हुए सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। कोर्ट के अनुसार स्थिति इतनी भयावह है कि करीब 20 लाख लोगों का जीवन और स्वास्थ्य खतरे में है।
“सिस्टम की नाकामी” – कोर्ट की सख्त टिप्पणी
रिपोर्ट में वर्षों से चल रहा औद्योगिक प्रदूषण, सरकारी एजेंसियों की लापरवाही, बिना ट्रीट किया हुआ केमिकल और सीवेज सीधे नदियों में डाले जाने का मामला सामने आया है। कोर्ट ने पूरे मामले को “सिस्टेमेटिक फेल्योर” बताया है।
जोधपुर में प्रदूषण का डबल अटैक, जोजरी नदी बनी ज़हरीली
जोधपुर स्थित उद्योगों कि बात करे तो उद्योगो से नीकलने वाला जहरीला बहाव यानी कि प्रदूषित पानी सीधे जोजरी नदी में जा रहा है। यहां 300 से ज्यादा टेक्सटाइल और स्टील यूनिट है और CETP होने के बावजूद प्रदूषित पानी प्रभावी ढंग से ट्रीटमेंट नहीं हो पा रहा है। जिसके कारण 230 MLD सीवेज के मुकाबले केवल 175 MLD ट्रीटमेंट होने के परिणामस्वरूप 55 MLD गंदा पानी सीधा नदी में जा रहा है। जोधपुर क्षेत्र में जोजरी नदी का प्रदूषित पानी, औद्योगिक कचरा और सीवेज साफ नजर आता है।
बाण्डी नदी बनी ज़हरीली नाली, पानी हुआ जानलेवा
तो दूसरी और पाली कि स्थिति सबसे खराब देखने मील रही है, खेती तबाह हो रही है, किसान बेहाल हो रहे है। पाली में CETP-4 बंद होने से हजारों टन खतरनाक कचरा जमा हो रहा है, परिणामस्वरूप अनट्रीटेड पानी बांडी नदी में बहा जा रहा है। यह प्रदूषित पानी से स्वास्थ्य और आजिविका दौनो तरफ से लोगो का जीवन प्रभावित हो रहा है। एक तरफ 1000 बीघा से भी ज्यादा जमीन बंजर हो रही है, तो दूसरी ओर “मिठिया बेरा” जैसे कुएं भी जहरीले हो रहे है।
800 बीघा जमीन बर्बाद, खेती पर संकट गहराया
बालोतरा औद्योगिक क्षेत्र की स्थिति खुली किताब जैसी है। यहां नियमों की खुली अनदेखी की जा रही है। यहां गिने चूंने उद्योग नियमों का पालन करता है, कारणवश स्लज और केमिकल का बहाव सीधे नदी में हो रहा है। यहां 800 बीघा जमीन बर्बाद हो गई है अने पशुओं पर गंभीर असर देखी जा रही है।
नदियों में बहाया जा रहा यह जहर अपनी खतरनाक असर दिखा रहा है। भूजल भी प्रदूषित हो रहा है, खेती के लिए पानी अनुपयोगी हो रहा है, गांवों में पीने के पानी की किल्लत आ रही है। तो दूसरी और बबूल के पेड़ सूखे पड रहे है, बबूल के पेड का सुखना अपने आप मे एक गंभीर चेतावनी मानी जाती है।
सुप्रीम कोर्ट सख्त, प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर कार्रवाई
सुप्रीम कोर्ट के सख्त आदेश है कि जीरो लिक्विड डिस्चार्ज अनिवार्य है, टैंकर सिस्टम पर पूर्ण प्रतिबंध है, अवैध उद्योग तुरंत बंद होने चाहिए, आईओटी (IoT) आधारित निगरानी होनी चाहिए, “Polluter Pays Principle” लागू हो, यह सभी कि उच्च स्तरीय समिति द्वारा निगरानी हौ।
हाई लेवल इकोसिस्टम ओवरसाइट कमिटी (High Level Ecosystem Oversight Committee) की अंतरिम रिपोर्ट को ध्यान में रखते हुए माननीय उच्चतम न्यायालय ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की और अपने आदेश में स्थिति पर नाराजगी जाहिर करते हुए कड़ी टिप्पणी की।
अपने आदेश में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा आरएसपीसीबी को निर्देश दिया गया कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वालों से पर्यावरणीय मुआवजा वसूला जाए।
जोधपुर में जो शेष Effluent Conveyance (कंड्यूट पाइपलाइन) का कार्य बाकी है, उसे 31 मार्च 2026 तक पूरा करने के निर्देश दिए गए हैं। यदि इसमें देरी होती है तो संबंधित अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया जाएगा।
प्रदूषण नियंत्रण मंडल को निर्देशित किया गया कि नदी किनारे किसी भी उद्योग को CTE (Consent to Establish) और CTO (Consent to Operate) प्रदान न किया जाए।
राजस्थान सरकार के संबंधित विभागों को उद्योगों के विरुद्ध तुरंत कार्रवाई करने तथा अवैध रूप से औद्योगिक अपशिष्ट का परिवहन करने वाले टैंकरों को जब्त करने और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।
सबसे महत्वपूर्ण — सरकार, प्रदूषण नियंत्रण मंडल और संबंधित विभागों को नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी होगी और पर्यावरणीय मुआवजा वसूलना होगा।
संचालन संस्था की निष्क्रियता (विफलता) पर माननीय उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि जब तक यह सुनिश्चित नहीं किया जाता कि सभी नदियों के निरीक्षण (मॉनिटरिंग) पर सही तरीके से रिपोर्टिंग होगी, तब तक संचालन संबंधी अनुमति माननीय उच्चतम न्यायालय से ही लेनी पड़ेगी।
उच्चतम न्यायालय द्वारा यह भी स्पष्ट किया गया कि अब किसी भी CETP या ETP द्वारा ट्रीटेड और अनट्रीटेड फ्लो अब नदियों में नहीं डाला जाएगा, अर्थात अब ZLD (Zero Liquid Discharge) का पालन कड़ाई से करना पड़ेगा।
पाली, जोधपुर, बालोतरा में नगर परिषद और RIICO द्वारा जितने भी ड्रेन्स के माध्यम से डिस्चार्ज करने वाले उद्योग हैं, उन्हें तीन महीने के भीतर अलग व्यवस्था बनानी होगी।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्पष्ट रूप से यह भी कहा गया कि केवल औद्योगिक अपशिष्ट ही नहीं बल्कि सीवेज का पानी भी नदियों में नहीं जाना चाहिए।
माननीय उच्चतम न्यायालय ने उन अधिकारियों के विरुद्ध भी सख्त कार्रवाई करने को कहा है, जो अपने दायित्वों के प्रति लापरवाही बरत रहे हैं।
जोधपुर–पाली–बालोतरा का यह मामला अब केवल पर्यावरण नहीं बल्कि मानव जीवन के लिए गंभीर संकट बन चुका है। अब देखना होगा कि कोर्ट के आदेश के बाद हालात में कितना सुधार होता है।
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