30 साल का प्रदूषण साम्राज्य बेनकाब: सुप्रीम कोर्ट की सख्ती से 1498 फैक्ट्रियों पर ताले, अधिकारियों पर गिरी गाज

सिर्फ फैक्ट्रियां नहीं, अब जवाबदेह होंगे अफसर भी: जोजरी-बाण्डी प्रदूषण मामले में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक प्रहार

  • अबकी बार सिर्फ कागजी नोटिस नहीं, सीधे जवाबदेही तय होगी।”
  • जोधपुर-पाली-बालोतरा औद्योगिक बेल्ट में हड़कंप
  • बड़ी प्रशासनिक गाज: सुप्रीम कोर्ट की हाईपावर कमेटी के औचक निरीक्षण के बाद प्रदूषण नियंत्रण मंडल की क्षेत्रीय अधिकारी समेत अन्य अधिकारी सस्पेंड
  • आवश्यकता पड़ी तो इस पूरे तंत्र की सीबीआई जांच भी कराई जा सकती है



जोधपुर/पाली/बालोतरा। जून 2026: “हुजूर! न्याय की आस में पीढ़ियाँ बीत गईं, पर आज जाकर लगा कि कानून की आँखों पर पट्टी नहीं है।” यह भाव आज मारवाड़ के उन सैकड़ों गाँवों का है जो पिछले दो दशकों से औद्योगिक जहर को अपनी रगों में उतरते देख रहे थे। राजस्थान की जोजरी-बाण्डी-लूणी नदी प्रदूषण कहानी ने जून 2026 में एक ऐसा ऐतिहासिक मोड़ ले लिया है, जिसकी कल्पना वर्षों से प्रदूषण का दंश झेल रहे ग्रामीणों ने भी नहीं की थी ।

सुप्रीम कोर्ट की अभूतपूर्व सख्ती, नई एसआईटी का गठन,1498 औद्योगिक इकाइयों पर पूर्ण या आंशिक तालाबंदी और प्रदूषण विभाग के आला अधिकारियों पर गिरी निलंबन की गाज ने इस पूरे मामले को केवल एक पर्यावरणीय विवाद नहीं, बल्कि प्रशासनिक भ्रष्टाचार और सामूहिक उदासीनता के खिलाफ देश की सबसे बड़ी न्यायिक मिसाल बना दिया है।

इस पूरे मामले में सबसे सनसनीखेज मोड़ तब आया जब जोधपुर के सांगरिया स्थित सीईटीपी (कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट) के पास एक बेहद शातिर तरीके से छिपाई गई अवैध पाइपलाइन पकड़ी गई। 28 मई की रात ठीक 2:00 बजे इस ‘नेक्सस’ को सुप्रीम कोर्ट की हाईपावर कमेटी ने रंगे हाथों पकड़ा और इस तरह आधी रात को 4 किमी लंबी ‘गुप्त’ अवैध पाइपलाइन का पर्दाफाश हुआ।

इस 4 किलोमीटर लंबी अवैध पाइपलाइन के जरिए टेक्सटाइल फैक्ट्रियों का अत्यधिक जहरीला, केमिकल युक्त काला पानी सीधे जोजरी नदी में उड़ेला जा रहा था। प्रशासन की नाक के नीचे सालों से यह खेल चल रहा था और जिम्मेदार अफसर आँखें मूंदे बैठे थे। इस गंभीर लापरवाही और मिलीभगत के सामने आने के बाद हड़कंप मच गया। प्रदूषण नियंत्रण मंडल के सदस्य सचिव कपिल चंद्रवाल की ओर से त्वरित आदेश जारी कर कड़ा एक्शन लिया गया।

अधिकारी 

होद्दा

एक्शन

कामिनी सोनगराआरओ (रीजनल ऑफिसर)निलंबित
देवेंद्र सिंहलैब इंचार्ज – जोधपुर ऑफिसनिलंबित
कुणाल खत्रीएईएननिलंबित

 

“यदि प्रदूषण वर्षों से जारी था, तो निगरानी करने वाली एजेंसियों को इसकी भनक क्यों नहीं लगी? क्या यह सब प्रशासनिक शह के बिना संभव था?” सुप्रीम कोर्ट ने यह कड़ा रुख अपनाते तल्ख टिप्पणी की कि “सच बताने के बजाय कोर्ट को गुमराह किया गया।”

सर्वोच्च न्यायालय के माननीय न्यायाधीश संदीप मेहता और न्यायाधीश विक्रमनाथ के आदेश पर गठित इस हाईपावर कमेटी (जिसकी अगुवाई सेवानिवृत्त न्यायाधीश संगीत लोढ़ा कर रहे हैं) के औचक निरीक्षण ने पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

अदालत ने बेहद तल्ख लहजे में कहा कि पूर्व में गठित एसआईटी ने वास्तविक स्थिति सामने रखने के बजाय कोर्ट को गुमराह करने का प्रयास किया और कई महत्वपूर्ण तथ्यों को छुपाया। इसी कारण अदालत को यहाँ तक कहना पड़ा कि यदि आवश्यकता पड़ी तो इस पूरे तंत्र की सीबीआई जांच भी कराई जा सकती है।

अब एक नई, उच्च-स्तरीय और तकनीकी विशेषज्ञों से लैस एसआईटी बनाई गई है जो मुख्य रूप से इन बिंदुओं पर जांच कर रही है: करोड़ों रुपये के बजट और सीईटीपी प्लांट्स के बावजूद क्यों नदियों मै इंडस्ट्रियल वेस्ट बिना उपचार के छोड़ा जा रहा है?; प्रदूषण फैलाने वाले असली ‘व्हाइट कॉलर’ उद्योगपति कौन हैं?;पिछले 20 सालों में किन-किन अधिकारियों ने फैक्ट्रियों को ‘क्लीन चिट’ देकर जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़ किया?

सुप्रीम कोर्ट के ‘कड़े तेवरों’ के बाद प्रदूषण मंडल ने एक साथ पांच बड़े औद्योगिक क्षेत्रों में फैक्ट्रियों को बंद करने, स्टॉक सील करने और उन्हें ‘मेंटेनेंस मोड’ पर डालने का आदेश दिया है। 1498 फैक्ट्रियों पर लटके ताले लगने से मारवाड़ का औद्योगिक ढांचा हिल गया है।

क्षेत्र

बंद की गईं औद्योगिक इकाइयाँ

मुख्य उद्योग प्रकार

पाली600टेक्सटाइल, रंगाई-छपाई
बालोतरा574सिंथेटिक और कॉटन टेक्सटाइल
जोधपुर300स्टेनलेस स्टील, टेक्सटाइल, केमिकल
बिठूजा214कपड़ा धुलाई और प्रोसेसिंग
जसोल110रॉट आयन और टेक्सटाइल इकाइयाँ
कुल बंद इकाइयाँ1498

 

न्याय की इस लड़ाई का दूसरा पहलू बेहद चिंताजनक और आजीविका संकट से जुड़ा है। अचानक इतनी बड़ी संख्या में फैक्ट्रियों के बंद होने से टेक्सटाइल और संबंधित उद्योगों की कमर टूट गई है। लगभग 80,000 से अधिक दिहाड़ी और स्थायी श्रमिक सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं। अचानक काम बंद होने से उनके सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया है। तो दूसरी और फैक्ट्रियों के बंद होने से ट्रांसपोर्ट, पैकेजिंग मटेरियल, केमिकल सप्लाई और मार्केट में कैश फ्लो पूरी तरह रुक गया है।

औद्योगिक संगठनों के अनुसार, इस तालाबंदी से प्रतिदिन लगभग 35 से 40 करोड़ रुपये का टर्नओवर प्रभावित हो रहा है। इसका सीधा असर स्थानीय किराना दुकानों, मकान किरायों और पूरे सर्विस सेक्टर पर पड़ रहा है। इन फैक्ट्रियों में काम करने वाले मज़दूरों की हालत के लिए, सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से, सिर्फ़ RSPCB के ज़िम्मेदार अधिकारी और फैक्ट्री मालिक ही ज़िम्मेदार माने जा सकते हैं।

जोजरी और बाण्डी नदी की यह स्थिति खेतों से लेकर इंसानी जिस्म तक तबाही की कहानी बयाँ कर रही है। इस न्यायिक सख्ती की सबसे बड़ी वजह वह मानवीय त्रासदी है, जिसे मारवाड़ के ग्रामीण दशकों से चुपचाप सह रहे थे। स्थानीय पर्यावरण कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों के अनुसार, रासायनिक अपशिष्ट और सीवरेज के अनियंत्रित बहाव ने कहर बरपाया है।

पचास से अधिक गाँवों की लाखों एकड़ उपजाऊ भूमि की उर्वरा शक्ति पूरी तरह नष्ट हो चुकी है। खेतों में फसल के बजाय केमिकल की परतें जम चुकी हैं। कुओं और नलकूपों का पानी रंग बदल चुका है और हवा में भारी दुर्गंध है। इन गाँवों में कैंसर, चर्म रोग, लीवर की बीमारियाँ और पेट के असाध्य रोग महामारी की तरह फैल चुके हैं। पानी पीने से सैकड़ों दुधारू पशु असमय मौत के गाल में समा चुके हैं।

जैसा कि वरिष्ठ पत्रकारों और विशेषज्ञों का मानना है, जोजरी का यह मामला केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है, यह सामूहिक उदासीनता का जीता-जागता उदाहरण है जिसने हंसती-खेलती नदियों को ‘बीमार और मृत’ कर दिया।

अब जबकि सच पूरी तरह बेनकाब हो चुका है, तो केवल चंद अफसरों के निलंबन, नोटिस या कागजी एफआईआर से इस नदी तंत्र को पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता। इसके लिए एक समयबद्ध और पारदर्शी स्थायी व्यवस्था की जरूरत है।

नदियां केवल जलधाराएं नहीं होतीं, वे किसी भी सभ्यता की जीवनरेखा होती हैं। जब एक नदी को न्याय मिलता है, तो दरअसल पूरे समाज, आने वाली पीढ़ी और पर्यावरण को न्याय मिलता है। सुप्रीम कोर्ट की यह पहल मारवाड़ के सुनहरे और स्वच्छ भविष्य की पहली किरण साबित हो सकती है।

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