Sabaramati River Pollution Case: यदि उपचारित प्रदूषित पानी में रंग नोन-बायोडिग्रेडेबल हो तो भी यह हमारे शरीर को नुकसान पहुंचाएगा: गुजरात हाई कोर्ट

  • उपचारित जल को भूजल के स्थान पर उद्योग को क्यों नहीं लौटाया जाता? – उच्च न्यायालय
  • उद्योगों को उपचारित जल को वापस देने पर अभी तक कोई अध्ययन नहीं: जीपीसीबी
  • साबरमती में प्रदूषण को नहीं रोका तो पैदा हो सकती है बेहद गंभीर स्थिति: हाई कोर्ट
  • अहमदाबाद में संचालित 7 सीईटीपी में से 6 सीईटीपी के सेम्पल ऑटो सैंपलिंग सिस्टम के माध्यम से लिया जाता है

अहमदाबाद: साबरमती नदी प्रदूषण से जुड़े स्वत: संज्ञान मामले में शुक्रवार को गुजरात हाई कोर्ट में आगे की सुनवाई हुई। मामले की आगे सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल और न्यायमूर्ति वैभवी नानावटी की पीठ के समक्ष हुई। विशाला ब्रिज के पास साबरमती नदी में प्रदूषण का एक वीडियो सामने आया था, जिसके आधार पर कोर्ट ने तत्काल सुनवाई करते हुए एएमसी, जीपीसीबी की क्लास लेने के बाद, आगे की सुनवाई कल शुक्रवार को की गई।

पिछली सुनवाई में वीडियो के मुताबिक साबरमती नदी में नाले में से केमिकल पानी का बहाव बहता देखा जाने के बाद इस संबंध में प्रदूषित पानी के सैंपल की जांच की बात कही गई थी। इस संबंध में आज सुनवाई के दौरान इस नाले से टोटल डिसॉल्व्ड सॉलिड यानी टीडीएस और रंग की मात्रा अधिक पाई गई, जिसकी जांच ज्वाइंट टास्क फोर्स और गुजरात प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड (जीपीसीबी) ने की। जबकि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) द्वारा उपचारित पानी उससे भी खराब था। टीडीएस की मात्रा नियमानुसार 1500 के स्थान पर 3900 पाई गई।

जबकि नदी में छोड़े जाने पर उपचारित पानी में सीओडी की मात्रा नियमों के अधीन होती है, लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उपचारित पानी रंगीन है या नहीं, ऐसा बतायें बाजे के बाद उच्च न्यायालय ने कहा कि यदि पानी में रंग नोन-बायोडिग्रेडेबल है, तब भी यह हमारे शरीर के लिए हानिकारक है। इस पानी का उपयोग किसान सब्जियों और अनाज की खेती में करते हैं और हम तक पहुंचते हैं। यह लोगों की सेहत के लिए कैंसर, आर्थराइटीस समेत कई गंभीर बीमारियों को न्योता दे सकता है।

जीपीसीबी की ओर से हाई कोर्ट को बताया गया कि जीपीसीबी द्वारा अहमदाबाद के 7 सीईटीपी में से 6 में ऑनलाइन मॉनिटरिंग सिस्टम के जरिए सैंपल टेस्टिंग की जाती है। ऑटो सैंपलिंग सिस्टम हर घंटे नमूने लेती है, पूरे दिन में कुल 24 नमूने लिए जाते हैं, जो जनरेट होने के बाद ऑनलाइन पोर्टल पर जाते हैं। इसके अलावा फिजिकल सैंपल भी लिया जाता है। हर दूसरे दिन एक फिजिकल सैंपल लिया जाता है और बाद में परीक्षण के लिए प्रयोगशाला में भेजा जाता है।

इस सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने जीपीसीबी से कहा कि उद्योगों को औद्योगिक उपयोग के लिए भूजल उपलब्ध कराया जाता है, तो उनके द्वारा उपचारित औद्योगिक प्रदूषित जल ही उन्हें वापस क्यों नहीं लौटाया जाता? हालांकि, जीपीसीबी ने कहा कि इस मुद्दे पर अभी तक कोई विचार या अध्ययन नहीं किया गया है।

इसके अलावा हाई कोर्ट द्वारा उद्योगों से जीरो डिस्चार्ज की बात भी दोहराई गई। उच्च न्यायालय ने डीप सी योजना के प्रस्ताव पर यह तर्क देते हुए रोक लगा दी थी कि यह हाई कोर्ट पहले ही इस विचार को खारिज कर चुका है। हाई कोर्ट ने कहा कि समुद्र विशाल है तो आप कुछ भी कर सकते हैं? महासागर और डीप सी का हम दोहन करते हैं। हाई कोर्ट ने कहा कि हमारे पास समय नहीं है, अगर हमने प्रदूषण पर काबू नहीं पाया तो बहुत गंभीर स्थिति पैदा हो सकती है।

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