“जब बाड़ ही खेत को खाए तो उस खेत को कौन बचाए”, लूनी की निर्मलता कैसे रहेगी बरकरार, फिर से शुरू होने से बालोतरा सीईटीपी चर्चा के केन्द्र मे आया
“बालोतरा स्थित सीईटीपी ट्रीटेड और अनट्रीटेड किसी भी प्रकार का एफल्यूंट लूनी नदी में नहीं डालेगा”
हाल ही पूरे विश्व में विश्व पर्यावरण दिवस का जश्न पूरी गर्मजोशी से मनाया गया। लेकिन, क्या यह गर्मजोशी सिर्फ एक ही दिन के लिये होती है? क्योंकि जश्न के बाद आम जन से लेकर प्रशासन तक हर कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पर्यावरणीय क्षति पहुँचाने वाले कार्यो में अपना योगदान देते है। यहां जिस घटना के बारे में हम बात करने जा रहे है, वह कुछ महिनों पुरानी है, लेकिन पर्यावरणीय संरक्षण के संबंध में अत्यांतिक महत्वपूर्ण है। और यह किस्सा बालोतरा स्थित सीईटीपी का है।
इस वर्ष जनवरी के अंतिम सप्ताह में, राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने बालोतरा CETP के निरीक्षण में पायी ढेंरो कमियों को देखते हुए राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने बडा कदम उठाते हुए ना सिर्फ CETP को बंद करवाया बल्कि सीइटीपी पर 50 लाख रूपये का जुर्माना लगाते हुए उससे जुडी लगभग 600 फेक्ट्रीयो को भी जब तक CETP सुचारू रूप से चालु नहीं हो जाता तब तक बंद रखने के आदेश दिये थे।
बालोतरा सीईटीपी बंध करने के आदेश के पीछे के घटना क्रम को देखे तो 29 व 30 जनवरी को बालोतरा स्थित कॉमन एफ्यूलेंट ट्रीटमेंट प्लांट का बोर्ड अधिकारीयो ने निरीक्षण किया ओर निरीक्षण के दौरान 18 एमएलडी के प्लांट में इतनी कमियां पाइ गई की बोर्ड को उसे आगामी आदेशों तक तुरंत बंद करवाने का निर्णय लेना पडा।
इसके अलावा, बोर्ड के अधिकारीओ ने पाया की 18 एमएलडी का प्लांट बंद पडा था ओर जिस कंपनी को ऑपरेशंस एन्ड मेंटेनंस दिया गया था वो अपना काम छोड चुके थे। मिस्ट पुरी तरह से खराब हो चुका था। RIICO एरिया में बहुत सारा एफ्लुयेंट गिरा पाया गया। लूनी नदी में भी एफ्लुयेंट पाया गया, जिससे प्रतीत होता था कि रात को नदी में बिना ट्रीटमेंट के एफ्लुयेंट को छोडा जा रहा है।
राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण मंडल के निरिक्षण दौरान पायी गई लूनी नदी को हो रही पर्यावरणीय क्षति को नजरअंदाज नही किया जा सकता, उसके बावजूद भी, बालोतरा सीईटीपी को फिर से कार्यरत किया गया, तभी यहां एक पुरानी कहावत याद आती है कि “जब बाड़ ही खेत को खाए तो उस खेत को कौन बचाए”।
सीईटीपी द्वारा इन सारी कमियों का निराकरण 15 से 30 दिन से पहले संभव नहीं था। माननीय नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के आदेशों की अवमानना के लिए जहां उन पर पर्यावरण मुआवजा लगना चाहिए था वहां पर राजनीतिक प्रभाव कहिए या उच्च स्तर के अधिकारियों की उदासीनता कहिए या उनका अति उत्साहित होकर काम करना कहिए कि बालोतरा सीईटीपी पर पर्यावरण मुआवजा लगाना तो दूर बिना सारी कमियां दूर किए ही उन्हें लगभग 5 दिन में ही पुन:चालू करने के आदेश फरमा दिए गए।
बालोतरा सीईटीपी बंद के आदेश के बाद कुछ ही दिनो के भीतर उसे फिर से कार्यरत करने का आदेश दिया गया, इस आदेश के पीछे प्रशासन की कौन सी मजबूरी रही होगी, जो लूनी नदी समेत पर्यावरण को होने वाले नुक्शान से भी बडी है।
6 मार्च 2019 को दिग्विजय सिंह वर्सेस राजस्थान सरकार व अन्य के मामले में माननीय नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने राजस्थान में जल प्रदूषण की बिगड़ती हुई स्थिति को देखते हुए एक आदेश दिया था कि “बालोतरा स्थित सीईटीपी ट्रीटेड और अनट्रीटेड किसी भी प्रकार का एफल्यूंट लूनी नदी में नहीं डालेगा।”. एनजीटी का पर्यावरण संरक्षण के पक्ष में दिये गये इतने महत्वपूर्ण आदेश को राजस्थान पोल्य़ुशन कंट्रोल बोर्ड के अधिकारीयो या संबंधित प्रशासन के संज्ञान में न हो, एसा हो नही सकता। या फिर उसे दूसरे तरीके से कहां जाये तो बालोतरा सीईटीपी को फिर से कार्यरत करने के आदेश को माननीय एनजीटी के आदेश की अवहेलना कहा जा सकता है।
पर देखा जाए तो अनेकों बार माननीय नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के आदेशों का उल्लंघन होता रहा है और आश्चर्य की बात है कि जिन अधिकारियों को प्रदूषण नियंत्रण की जिम्मेदारी सोपी गई थी तो क्या उन्होंने ही प्रदूषण फैलाने में सहयोग प्रदान किया?
पूरी दुनिया प्रदूषण के खिलाफ लड़ रही है और हमारे देश की तो भयावह स्थिति को देखते हुए केंद्र सरकार व राज्य सरकारों ने कड़े नियम और नीतिगत निर्णय लिए हैं पर क्या कुछ सरकारी अधिकारीयो की उदासीनता और गलत निर्णय ने प्रदूषण नियंत्रण मंडल को पर्यावरण नियंत्रण मंडल का दर्जा दे दिया है?
लूनी नदी प्रदूषित हो रही हो, फिर भी बालोतरा सीईटीपी पुनःकार्यरत किये जाने से यह चर्चा का केन्द्र बन गया है। लेकिन यह पूरी घटना से हम सभी के सामने एक प्रश्न है की क्या इन सब के चलते विश्व के सर्वाधिक प्रदूषित देश में हमारा जो तीसरा स्थान है वह कभी बदल पाएगा?, हमारे माथे पर जो प्रदूषण फैलाने का तिलक लगा है वह कभी हट पाएगा? यदि वाकई हम हमारे देश में प्रदूषण कम करना चाहते हैं तो ऐसी घटनाओं को गंभीरता से लिया जाना चाहिए और प्रदूषण फैलाने या उसमें सहयोग करने वालों की जवाबदेही तय करनी चाहिए और उनके खिलाफ दंडनीय कार्यवाही भी करनी चाहिए।