जलवायु सम्मेलन के परिणाम निराश करने वाले: अरुणाभा घोष

नयी दिल्ली: पर्यावरण एवं जल सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में काम करने वाले गैर सरकारी संगठन काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) के मुख्य अधिशासी अधिकारी (सीईओ) डॉ. अरुणाभा घोष ने बुधवार को कहा कि दुबई में हुए जलवायु सम्मेलन के नतीजे निराशजनक रहे हैं।

डॉ घोष ने कहा, “मौजूदा कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज (कॉप28) ने सभी मोर्चों पर काफी हद तक निराश किया है। इस सम्मेलन ने न तो जलवायु महत्वाकांक्षा को पर्याप्त रूप से बढ़ाया है, न ही ऐतिहासिक प्रदूषकों की जवाबदेही तय की है।”

नयी दिल्ली स्थित संस्था सीईईडब्ल्यू के सीईओ ने दुबई से लौटने के बाद जारी बयान में कहा कि कॉप28 ग्लोबल साउथ (दक्षिणी गोलार्ध के विकासशील और गरीब देशों) के लिए जलवायु परिवर्तन से लड़ने में समर्थ बनाए जाने और कम कार्बन उत्सर्जन की दिशा में परिवर्तन के वित्तपोषण के लिए कोई प्रभावी तंत्र भी नहीं बना सका है।

उल्लेखनीय है कि कॉप28 में भारत की ओर से वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा था कि इस सम्मेलन में विकसित देश अपने जलवायु संबंधी लक्ष्यों और प्रतिबद्धताओं को बढ़ाएं तथा जवायु परिवर्तन से निपटने के लिए पर्याप्त वित्त पोषण की व्यवस्था हो और धन का प्रबंध विकाशील देशों की जरूरतों से निर्देशित हो।

पेरिस समझौते के तहत विकसित देशों ने जलवायु वित्त के लिए सालाना 100 अरब डालर देने की प्रतिबद्धता जतायी थी। विकासशील देशों के संगठनों का कहना है कि इस समय ‘बिलियन्स नहीं ट्रिलियंस’ (सैकडों नहीं, हजारों अरब डालर) के जलवायु वित्त पोषण की जरूरत है, लेकिन विकसित देशों का वास्तविक योगदान अब तक 40 अरब से 80-85 अरब डालर के बीच ही रहा है।

डॉ घोष ने कहा कि दुबई सम्मेलन में भले ही पहले दिन हानि एवं क्षति कोष के संचालन पर उल्लेखनीय सफलता मिली हो, लेकिन उसके बाद के घटनाक्रम उतार-चढ़ाव से भरे रहे। पेरिस समझौते के लक्ष्यों की दिशा में सामूहिक प्रगति के आकलन (ग्लोबल स्टॉकटेक) के अंतिम पाठ में समस्याओं को स्पष्ट रूप से स्वीकार करने और उनका सामना करने के लिए जरूरी क्षमता का अभाव दिखाई दिया।

उन्होंने कहा कि सभी जीवाश्म ईंधनों के विपरीत, बेरोकटोक कोयले में तेजी से चरणबद्ध कटौती पर विशेष जोर दिया गया, जो उत्तर-दक्षिण वैश्विक विभाजन को और गहरा करने का जोखिम बढ़ाता है। उन्होंने आगे कहा, “जीवाश्म ईंधन पर विशेष ध्यान दिए जाने के बावजूद, चरणबद्ध कटौती को जमीन पर उतारने के लिए अक्षय ऊर्जा और जलवायु वित्त को एक साथ मजबूती से आगे बढ़ाने की जरूरत है, खास तौर पर उभरती अर्थव्यवस्थाओं में, जो पर्यावरण अनुकूल प्रयासों की दिशा में बड़ी छलांग लगाने (ग्रीन लीप) के लिए तैयार हैं।”

उन्होंने कहा कि प्रभावी वित्तीय तंत्र स्थापित करने और ऐतिहासिक उत्सर्जनकर्ताओं को योगदान करने के लिए बाध्य करने में कॉप28 की विफलता से विकासशील देशों को, उनके एनडीसी (राष्ट्रीय स्तर पर घोषित प्रतिबद्धताओं) को पूरा करने के लिए आवश्यक सहायता का मलना कठिन हो गया है।

डॉ घोष ने कहा, “जलवायु संकट की तात्कालिकता यह मांग करती है कि कॉप प्रक्रिया में तुरंत सुधार किया जाए, ताकि सभी प्रयासों में उत्तरदायित्व, कार्यान्वयन और जलवायु न्याय को केंद्र में रखना सुनिश्चित किया जा सके। अन्यथा, भविष्य में होने वाले कॉप के अनुपयोगी बन जाने का खतरा है।”

गौरतलब है कि संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की अध्यक्षता में कॉप28 दुबई में 30 नवंबर को शुरू हुआ और 12 दिसंबर को सम्पन्न हुआ।

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